(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

महाभारत का अरयण्क पर्व – Mahabharat Aranyak Parv in Hindi


॥ श्रीः ॥
3.96. अध्यायः 096
Mahabharata - Vana Parva - Chapter Topics
धनयाचनाय श्रुतर्वादिनृपत्रयमुपगतेनागस्त्येन तद्धनानां समायव्ययतापरिज्ञानेन तैःसह इल्वलं प्रति गमनम् ॥ 1 ॥
Mahabharata - Vana Parva - Chapter Text

लोमश उवाच। 3-96-0x(2017)(19911)
ततो जगाम कौरव्य सोऽगस्त्यो भिक्षितुं वसु।
श्रुतर्वाणं महीपालं यं वेदाभ्यधिकं नृपैः ॥ 3-96-1(19912)
स विदित्वा तु नृपतिः कुम्भयोनिमुपागतम्।
विषयान्ते सहामात्यः प्रत्यगृह्णात्सुसत्कृतम् ॥ 3-96-2(19913)
तस्मै चार्घ्यं थान्यायमानीय पृथिवीपतिः।
प्राञ्जलिः प्रयतो भूत्वापप्रच्छागमनेऽर्थिताम् ॥ 3-96-3(19914)
अगस्त्य उवाच। 3-96-4x(2018)
वित्तार्थिनमनुप्राप्तं विद्धि मां पृथिवीपते।
थाशक्त्यविहिंस्यान्यान्संविभागं प्रयच्छ मे ॥ 3-96-4(19915)
लोमश उवाच। 3-96-5x(2019)
तत आयव्ययौ पूर्णो तस्मै राजा न्यवेदयत्।
अतो विद्वन्नुपादत्स्व यदत्रव्यतिरिच्यते ॥ 3-96-5(19916)
तत आयव्ययौ दृष्ट्वा समौ सममतिर्द्विजः।
सर्वथा प्राणिनां पीडामुपादानादमन्यत ॥ 3-96-6(19917)
स श्रुतर्वाणमादाय ब्रध्नश्वमगमत्ततः।
स च तौ विषयस्यान्ते प्रत्यगृह्णाद्यथाविधि ॥ 3-96-7(19918)
तयोरर्ध्यं च पाद्यं च ब्रध्नश्वः प्रत्यवेदयत्।
अनुज्ञाप्यच पप्रच्छ प्रयोजनमुपक्रमे।
`वद कामं मुनिश्रेष्ठ धन्योस्म्यागमनेन ते' ॥ 3-96-8(19919)
अगस्त्य उवाच। 3-96-9x(2020)
वित्तकामाविह प्राप्तौ विद्ध्यावां पृथिवीपते।
यथाशक्त्यविहिंस्यान्यान्संविभागं प्रयच्छ नौ ॥ 3-96-9(19920)
लोमश उवाच। 3-96-10x(2021)
तत आयव्ययौ पूर्णौ ताभ्यां राजा न्यवेदयत्।
अतो ज्ञात्वा तु गृह्णीतं यदत्रव्यतिरिच्यते ॥ 3-96-10(19921)
तत आयव्ययौ दृष्ट्वासमौ सममतिर्द्विजः।
सर्वथा प्राणिनां पीडामुपादानादमन्यत ॥ 3-96-11(19922)
पौरुकुत्सं ततो जग्मुस्त्रसदस्युं महाधनम्।
अगस्त्यश्च श्रुतर्वा च ब्रध्नश्वश्च महीपतिः ॥ 3-96-12(19923)
त्रसदस्युस्तु तान्दृष्ट्वा प्रत्यगृह्णाद्यथाविधि।
अभिगम्य महाराज विषयान्ते महामनाः ॥ 3-96-13(19924)
अर्चयित्वा यथान्यायमैक्ष्वाको राजसत्तमः।
समस्तांश्च ततोऽपच्छत्प्रयोजनमुपक्रमे ॥ 3-96-14(19925)
अगस्त्य उवाच। 3-96-15x(2022)
वित्तकामानिह प्राप्तान्विद्धि नः पृथिवीपते।
यथाशक्त्यवीहिंस्यान्यान्संविभागं प्रयच्छ नः ॥ 3-96-15(19926)
लोमश उवाच। 3-96-16x(2023)
तत आयव्ययौ पूर्णौ तेषां राजा न्यवेदयत्।
एतज्ज्ञात्वा ह्युपादद्ध्वं यदत्रव्यतिरिच्यते ॥ 3-96-16(19927)
तत आयव्ययौ दृष्ट्वासमौ सममतिर्द्विजः।
सर्वथा प्राणिनां पीडामुपादानादमन्यत ॥ 3-96-17(19928)
ततः सर्वे समेत्याथ ते नृपास्तं महामुनिम्।
इदमूचुर्महाराज समवेक्ष्य परस्परम् ॥ 3-96-18(19929)
अयं वै दानवो ब्रह्मन्निल्वलो वसुमान्भुवि।
तमतिक्रम्य सर्वेऽद्यवयं चार्तामहे वसु ॥ 3-96-19(19930)
लोमश उवाच। 3-96-20x(2024)
3-96-20(19931)
तेषां तदासीदुचितमिल्वलस्यैव भिक्षणम्।
ततस्ते सहिता राजन्निल्वलं समुपाद्रवन् ॥
Mahabharata - Vana Parva - Chapter Footnotes
3-96-2 विषयान्ते देशसीमान्ते ॥ 3-96-3 आगमने निमित्तभूतां अर्थिताम्। किमिच्छन्नागतोसीति पप्रच्छेत्यर्थः ॥ 3-96-6 उपादानात् धनग्रहणात् ॥ 3-96-7 वाध्र्यश्वमगमत्तत इति क. ध. पाठः ॥ 3-96-8 उपक्रमे आगमने ॥ 3-96-9 नौ आवाभ्याम् ॥ 3-96-19 वसुमान् धनवान् ॥


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